पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ा प्यार
यूँ तो हम इकिस्वि सदी के "मॉडर्न" लोग हैं| मगर इस मॉडर्न अथवा आधुनिक मनुष्य की सोच किसी आदिकाल के आदिमानव से कम नही | जहाँ एक तरफ देश व दुनिया प्रगति के मार्ग पर है, वही दूसरी तरफ कुछ पितृसत्ता से प्रभावित लोग औरतों को किसी वस्तु के साथ तौलने से नही कतराते | यह सब सहसा शुरु हुआ उसने उसकी आँखों में देखा पलके झुकाई, ज़रा मुस्कुराइ, फिर ज़रा शर्माई || प्यार का सफर, उन्होंने संग किया तय आशा थी की वे आनंद के आकाश में ऊँचे उड़ चले, प्यार की नदी को खुशियो की तैराकी से पार करे, एक दूसरे के लिए बारिश में धूप ले आये, दर्द के काँटों में फूल की बरसात कर पाए|| तूने ये छोटे कपड़े क्यू पहने है, ये फोन में नंबर किसका है, इधर मत जाना, उससे बात मत करना, ए आईना बता इसे, इसका तराजू में क्या तौल है, क्या ये बहुत मोटी है, या कुछ ज्यादा ही तिनके के समान है, स्नेह जैसे पावन भाव को, उसने तो जिस्म से आंक लिया उस गहरे समुद्र का पानी , फिर छलक के बाहर गिरा, वह तो चिड़िया थी खुले आसमां की, बंदिशों मे कहाँ आने वाली...